इसे इंसान की मजबूरी कहें या कुछ और लेकिन यह सच है कि पहले मां की कोख किराए पर मिलती थी और अब मां का दूध भी ‘मानव दूध बैंक’ के जरिए बिकने लगा है ।

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि  अपना दूध मानव दूध बैंकों को मुहैया करवाने वाली महिलाएं उसके बदले में पैसा लेती है या नहीं लेकिन कुछ मानव दूध बैंक इसके लिए छोटा-मोटा शुल्क वसूलते हैं।

बेंगलुरु में मानव दूध का सबसे पहला बैंक 2017 में  खुला था जो अब 45 अस्पतालों को मानव दूध उपलब्ध करवाता है। यह दूध सरकारी अस्पतालों में निशुल्क और निजी अस्पतालों में आढ़ाई रुपए के करीब प्रति मिलीलीटर के हिसाब से उपलब्ध करवाया जाता है । हालांकि अमारा नाम का यह मानव दूध बैंक नॉनप्रॉफिट संगठन है लेकिन दूध बैंक चलाने के छोटे-मोटे खर्चों की पूर्ति के लिए मामूली पैसा लोगों से वसूल करता है।

नवजात बच्चों की जान बचा रहे हैं मानव-दूध बैंक

प्रीमेच्योर बेबी यानी कि समय से पैदा होने वाले बच्चे अपनी मां का दूध नहीं  पी पाते क्योंकि समय से पहले होने वाली डिलीवरी में मां का दूध नहीं बनता या फिर कम बनता है ।ऐसे में बच्चों को कृत्रिम दूध देने का मतलब है उनकी जिंदगी खतरे में डालना । क्योंकि जानवरों का दूध नवजात शिशु को पिलाने से उनको संक्रमण होने का खतरा रहता है।

इस तरह के मानव दूध बैंक दिल्ली मुंबई उदयपुर और बेंगलुरु में स्थापित किए जा चुके हैं।

लेकिन मानव दूध को लेकर एक तरफ जहां कई परिवार तरह तरह की आशंकाओं से घिरे हुए रहते हैं वही अपना दूध दान करने वाली महिलाओं की भी गिनती ज्यादा नहीं है।

लेकिन जो भी महिलाएं अपना दूध दान कर ही हैं वह नवजात शिशु की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है।

 

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